‘चलता’ है का फार्मूला अब और नहीं

December 30, 2012

2012 की घटनाओं पर नजर डालने से परेशानी ही होती है.

अच्छी बात यह रही कि कयामत की भविष्यवाणी गलत साबित हुई और ऐसा ही सबको भरोसा भी था. आर्थिक विकास दर 10 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. घोटालों का ऐसा दौर चला कि राजनेताओं पर से भरोसा उठने लगा. सरकार की साख गिरी, संसद महीनों तक ठप रही और बड़े फैसले लेने में काफी देरी हुई. सरकार पर पॉलिसी पेरालिसिस के आरोप भी लगे और जब सरकार ने फैसले लेने शुरू किए तो ममता दीदी ने यूपीए से समर्थन वापस लेकर राजनीतिक संकट पैदा कर दिया.

लंदन ओलंपिक में हमारे खिलाड़ियों का प्रदर्शन अच्छा रहा. पहली बार हमारी झोली में छह मेडल आए जो पिछले ओलंपिक से तीन ज्यादा हैं. व्यक्तिगत स्पर्धा में सुशील कुमार ने लगातार दो ओलंपिक में मेडल हासिल कर रिकार्ड बनाया जबकि साइना नेहवाल और मैरी कॉम ने अपनी-अपनी स्पर्धा में कीर्तिमान स्थापित कर देश का नाम रोशन किया. लेकिन क्रिकेटरों ने पूरा साल निराश किया. कई सालों बाद हम अपने ही घर में टेस्ट सीरीज हारे. टी-20 र्वल्ड कप में हमारी टीम एक बार फिर सेमीफाइनल में जगह बनाने में नाकाम रही. देश के दो महान खिलाड़ी-वीवी एस लक्ष्मण और राहुल द्रविड़-ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया और महानतम खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर के वनडे क्रिकेट को बाय-बाय करने से यह मायूसी और बढ़ी.

इस साल कई ऐसे लोग हमें छोड़कर चले गए, जिनका भारतीय जीवन पर गहरा प्रभाव है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल की कमी हमें हमेशा खलेगी. उन्होंने साबित किया था कि राजनीति में भी भले मानुष की जगह है. जोड़-तोड़ की राजनीति के दिनों में भी उन्होंने कभी अपनी अच्छाई नहीं छोड़ी और अपनी इसी खासियत की वजह से वह प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करने में सफल हुए.

यश चोपड़ा भी हमें बहुत याद आएंगे. प्यार बांटने की उनकी बेमिसाल कला की कमी हमेशा खलेगी. हिंदी फिल्मों के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना भी इसी साल हमें छोड़ कर चले गए. और साल के आखिरी दिनों में रविशंकर जैसा रत्न भी हमने खोया. रविशंकर पिछले चार दशक से हमारे देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक एम्बेसडर थे और उनकी कमी संभवत: कभी पूरी नहीं हो सकेगी. साल के आखिरी महीने में दिल्ली में 23 साल की लड़की के साथ गैंग रेप और 13 दिन के बाद उसकी मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया. दुर्भाग्य से बलात्कार की वीभत्स घटनाएं पहले भी हुई हैं लेकिन इसकी वीभत्सता से पूरा देश सहम गया और लोगों का गुस्सा अब भी शांत नहीं हो रहा है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि 2012 ने हमें दुख दिया, निराशा दी, महंगाई दी, घोटाले दिए और न जाने क्या-क्या दिए. इसका मतलब यह नहीं है कि इस साल सब बुरा ही हुआ. मेरा बस यही कहना है कि इस साल हमें खुशी की तुलना में ज्यादा गम मिले. अब सवाल है कि 2013 कैसा होगा? मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं और न ही भविष्यवाणी करने में कोई रुचि है. पर मैं जो ट्रेंड देख रहा हूं, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अगले साल खुशी-गम का समीकरण 2012 का ठीक उलटा होगा.

पश्चिम के देशों में 13 नम्बर को अशुभ माना जाता है. लेकिन हमारे देश के प्रथम नागरिक के लिए यह नम्बर शुभ रहा है. इसी से यह भरोसा जगता है कि पूरे देश के लिए 2013 के उम्मीदों से बेहतर साल रहेगा. इसकी वजह 2012 के घटनाक्रम में ही छुपी है. इस साल सितम्बर के बाद आर्थिक मोच्रे पर कई बड़े फैसले लिए गए. डीजल की कीमत बढ़ाई गई, एलपीजी सिलेंडर का कोटा तय कर दिया गया, मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश को मंजूरी दी गई और बैंकिंग विधेयक को संसद में मंजूरी मिली.

यह सब ऐसे माहौल में हुआ जब फैसला लेना मुश्किल हो रहा था और सरकार और विपक्ष के बीच दूरियां काफी बढ़ गई थीं. इन फैसलों का काफी विरोध भी हुआ. लेकिन न तो फैसले वापस लिए गए और न सरकार को कोई खतरा हुआ. इससे यह संकेत मिलता है कि मतभेदों के बावजूद आर्थिक मुद्दों पर देश में आम सहमति है और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी बड़े फैसले हो सकते हैं. इससे भरोसा जगता है कि 2013 में विकास की दर काफी तेज होने वाली है. साथ ही रिजर्व बैंक जनवरी से ब्याज दरों में कटौती के संकेत दे ही चुका है. ब्याज दर में कटौती से इंडस्ट्री को निवेश के लिए आसान शतरे पर पैसे मिलेंगे और लोगों को सपने का घर या पसंदीदा कार खरीदने के लिए लोन सस्ता हो जाएगा. और इस सबका फायदा विकास दर में बढ़ोतरी के रूप में दिखेगा.

मेरे भरोसे की दूसरी वजह है, देश के लोगों की बढ़ती जागरूकता. अब लोगों ने ‘चलता है’ वाले फॉमरूले को छोड़ना शुरू कर दिया है. जनता मुखर हो गई है और वह शॉर्ट-कट को मानने के लिए अब तैयार नहीं है. इसकी शुरुआत अन्ना हजारे के आंदोलन से हुई और हाल के दिनों में दिल्ली और देश के दूसरे इलाकों में लोगों ने अपनी बात जोर-शोर से कही है. नेताओं के लिए भले ही यह बुरी खबर हो सकती है लेकिन लोकतंत्र के लिए यह बड़ी अच्छी खबर है. लोकतंत्र सही ढंग से चले इसके लिए जनता का जागरूक होना बहुत जरूरी होता है. जागरूक जनता शासक से हिसाब मांगती है और कम नम्बरों वालों को फेल कर देती है. अब शासन तंत्र को समय पर सही फैसले लेने होंगे. फैसलों में जनता का इनपुट होगा और शासन तंत्र में लोगों की भागीदारी बढ़ेगी. इस प्रक्रिया को हम 2013 में फलते-फूलते देखेंगे. 23 साल की लड़की का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा.

2013 में वैश्विक माहौल भी बेहतर होगा. अमेरिका की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है. यूरोप के ऊपर से संकट के बादल छंटते नजर आ रहे हैं. चीन में तेजी की शुरुआत फिर से हो गई है. जापान में हाल ही में नए प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए हैं और उनका दावा है कि वह हर हाल में वहां की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाएंगे. बेहतर वैश्विक माहौल का हमारी अर्थव्यवस्था को भी फायदा होगा. शेयर बाजार इसके संकेत लगातार दे ही रहा है. 2012 में सेंसेक्स ने अब तक 22 परसेंट का रिटर्न दिया है और विदेशी संस्थागत निवेशकों ने रिकार्ड खरीदारी की है.

मैं जब यह लेख लिख रहा था, उसी समय खबर आई कि वह जिसने हमें जगाया, वह खुद चिर निद्रा में चली गई. सिंगापुर के अस्पताल में गैंग रेप की शिकार लड़की ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उसे सही श्रद्धांजलि यह होगी कि हम सभी बेहतर 2013 बनाने की कोशिश करें. एक बेहतर समाज और देश के निर्माण में हम सबको अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी.


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ

 
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