पाक से मायूस है अमन का कारवां

January 13, 2013

पिछले महीने भारत और पाकिस्तान के बीच ‘अमन की आशा’ प्रबल होने लगी थी.

कई सालों बाद पाकिस्तान की क्रिकेट टीम का भारत दौरा हुआ. दो टी-20 और तीन वनडे मैच खेले गए. कई पाकिस्तानी क्रिकेटर भारत आए. माहौल बदलने लगा था. लगा कि 26/11 के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ी कड़वाहट कम होने लगी है. इसी दौरान दोनों देशों के बीच वीजा नियमों को सरल बनाने पर सहमति बनी. उम्मीद जगी कि लोगों का आना-जाना बढ़ेगा तो रिश्तों में आई दूरियां कम होंगी. लेकिन ‘अमन की आशा’ को फिर से नजर लग गई है.

इस हफ्ते खबर आई कि अपने देश के दो सैनिकों को पाकिस्तानियों ने बेरहमी से मार दिया. पाकिस्तानियों ने न केवल युद्धविराम का उल्लंघन किया बल्कि भारत के दो जवानों को बेरहमी से मारा, उनके शरीर के साथ पाशविक सलूक किया और एक जवान का सिर भी कथित तौर पर अपने साथ ले गए. पाकिस्तानियों की निर्ममता ने पूरे देश को झकझोरा है. सरकार के कड़े तेवर दिखे. विपक्षी पार्टियों ने भी इस नृशंस हत्या की निंदा की है. भाजपा तो राजनयिक रिश्तों के मौजूदा दौर पर सवाल उठा रही है. अन्ना हजारे ने तो यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान के होश ठिकाने लगाने के लिए ‘आर या पार’ करने की जरूरत है. कुल मिलाकर अमन की बात तो दूर, अब बात हो रही है कि पाकिस्तान के साथ दूरियां फिर से कैसे बढ़ाई जाएं.

दूसरी तरफ पूरी घटना पर पाकिस्तान का वही रवैया कायम है- वहां कि सरकार या वहां की सेना का इस निंदनीय घटना से कोई लेना-देना नहीं है. पाकिस्तान का कहना है कि उसकी सेना ने एलओसी पर युद्धविराम का उल्लंघन नहीं किया है. उलटे पाकिस्तान ने कह दिया कि भारतीय सेना ने उसके जवान को छह जनवरी को मार गिराया. बयानबाजी के साथ-साथ, पाकिस्तान ने फल और सब्जी ले जा रहे भारतीय ट्रकों को सीमा पर रोक दिया. और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर व जम्मू कश्मीर के बीच चलने वाली कारवां-ए-अमन बस सेवा को भी स्थगित कर दिया है.

पाकिस्तान के इस रवैए से पूरा देश गुस्से में है. सारे सबूतों के बावजूद पाकिस्तान अब तक मना करता आ रहा है कि 26/11 को मुंबई में हुए आतंकी हमले में पाकिस्तानियों का कोई हाथ था. पाकिस्तान यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि आतंकवादियों के सरगना हाफिज सईद का मुंबई हमले में कोई हाथ है. पाकिस्तान यह भी मानने के लिए तैयार नहीं है कि मुंबई हमले में शामिल आतंकवादियों को ट्रेनिंग पाकिस्तान में दी गई और पूरे हमले को उसी की जमीन पर स्थित कंट्रोल रूम से नियंत्रित किया गया. पाकिस्तान के इसी रवैए से पूरा देश खफा है. वायुसेना चीफ ने तो इतना तक कह दिया है कि पाकिस्तान इसी तरह से सारे नियमों की धज्जियां उड़ाता रहा तो हमें सारे ‘ऑप्शन’ पर विचार करना होगा.

सवाल है कि किस-किस ‘ऑप्शन’ पर विचार हो सकता है? क्या करगिल जैसे हालात फिर से पैदा हो सकते हैं? क्या भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत के सारे रास्ते फिर से बंद हो रहे हैं? विपक्षी नेताओं की मांग है कि हमें इस्लामाबाद से राजनयिक को वापस बुला लेना चाहिए और पाकिस्तान के साथ सारे विश्वास बहाली के कदम (सीबीएम) उठाने बंद कर देने चाहिए.

कोई फैसला लेने से पहले हमें यह खयाल रखना चाहिए कि पाकिस्तान के शासन तंत्र की कई परतें है. बाहरी दुनिया के लिए शासन तंत्र के मुखिया वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी हैं. लेकिन पाकिस्तान में इस सिविलियन सरकार का शासन तंत्र पर पूरा कंट्रोल नहीं है. दूसरी परत के मुखिया पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल अशफाक परवेज कयानी हैं. कयानी ने आज तक सिविलियन सरकार के कामकाज में दखल नहीं दिया है. लेकिन कयानी इसी साल सेवानिवृत्त होने वाले हैं. इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान का कोई भी आर्मी चीफ आसानी से कुर्सी नहीं छोड़ता है. संभव है कि अपनी कुर्सी बचाने के लिए कयानी ऐसे हालात पैदा करने की कोशिश करें जिससे आर्मी की भूमिका बढ़ जाए. हो सकता है कि भारत के साथ ताजा विवाद एक सैन्य साजिश हो, जिसे कयानी की ओर से शह मिल रही हो और जिसका पता वहां की सिविलियन सरकार को भी न हो.

पाकिस्तान के शासन तंत्र में आर्मी और सिविलियन सरकार के अलावा एक ग्रुप की भी बड़ी भूमिका है, जिसे नॉन स्टेट एक्टर्स कहा जाता है. इस ग्रुप को चलाने और फैलाने का काम हाफिज सईद जैसे लोग करते हैं. इस ग्रुप की बेचैनी तब काफी बढ़ जाती है जब भारत-पाकिस्तान के बीच अमन-चैन का माहौल बनने लगता है. हाल में पाकिस्तान की क्रिकेट टीम के भारत दौरे के बाद इसी तरह का माहौल बनने लगा था, जो इस ग्रुप को नागवार गुजरा. हो सकता है कि माहौल को विषाक्त करने के पीछे इस ग्रुप का हाथ हो. खबर भी आई थी कि जिस इलाके में भारत के दो जवानों को बेरहमी से मारा गया वहां कुछ दिन पहले हाफिज सईद का दौरा हुआ था. इन्हीं इलाकों में हाफिज सईद के ट्रेनिंग कैंप भी चलते हैं.

पाकिस्तान के शासन तंत्र की ये तीनों परतें करीब-करीब स्वायत्त हैं. कई मामलों में ये तीनों तंत्र साथ-साथ काम करते हैं, लेकिन कई ऐसे मामले भी हैं जहां इन तीनों में मतभेद हो जाता है. हमारे लिए फिलहाल यह जानना सबसे जरूरी है कि ताजा विवाद के पीछे किस तंत्र का हाथ है. और हमारी प्रतिक्रिया भी उसी हिसाब से होनी चाहिए.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पाकिस्तान भरोसेमंद पड़ोसी नहीं है. वहां की सरकार पर अगर भरोसा कर भी लिया जाए तो वहां की आर्मी और नॉन स्टेट एक्टर्स की हरकतें हमेशा संदेहास्पद रहती हैं. सरकार के वादों को वहां की आर्मी और नान स्टेट एक्टर्स मान लें, ऐसा होता नहीं है. पाकिस्तान में इसी साल चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में वहां के सारे ग्रुपों में भारत विरोधी नारे लगाने की होड़ लगी है. इन हालात में हमारी सेना और हमारी सरकार को संयम से काम लेना होगा. जल्दबाजी में हम किसी ऐसे ऑप्शन का चुनाव न करें जिससे माहौल और बिगड़ जाए. पाकिस्तान ऐसा नासूर है जिसका इलाज ऑपरेशन नहीं है. उसे मरहम-पट्टी के साथ एंटीबायोटिक के बूस्टर डोज की जरूरत है. हमें इन दोनों का इस्तेमाल करना चाहिए और सर्जरी से बचना चाहिए.


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ

 
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