पड़ोस में नये ’दुश्मन‘ की आहट!

August 15, 2021

बीते 15 अप्रैल को तालिबान के कमांडर हाजी हेकमत ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि हमने जंग जीत ली है और अमेरिका युद्ध हार चुका है।

और अब चार महीने बाद हिकमत की कही ये बात काफी हद तक सही साबित हो चुकी है। तालिबान ने अफगानिस्तान की बड़ी जमीन पर क्लीन स्वीप कर लिया है। तालिबान का झंडा अब अफगानिस्तान के 75 फीसद से ज्यादा इलाकों पर फहरा रहा है। एक के बाद एक प्रांतों पर तालिबान का कब्जा हो रहा है और चौतरफा अफरा तफरी का माहौल है। कंधार, हेरात जैसे बड़े शहरों में स्थानीय प्रशासन ने तालिबान के सामने सरेंडर कर दिया है। दहशत से घिरी अफगानी जनता ने या तो खुद को घरों में कैद कर लिया है या सुरक्षित बचे देश के अकेले बड़े शहर काबुल में शरण ले रखी है। इससे काबुल अब देश की राजधानी के साथ ही शरणार्थियों की राजधानी भी बन गया है।

गुरुवार को अफगानिस्तान की निर्वाचित सरकार ने कतर की मध्यस्थता में तालिबान से बातचीत की और उसे हिंसा छोड़ने की शर्त पर सत्ता में हिस्सेदारी का भी ऑफर दिया, लेकिन राष्ट्रपति अशरफ गनी की विदाई पर अड़े तालिबान ने ये पेशकश ठुकरा दी। इधर अशरफ गनी ने इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है और आखिरी सांस तक जंग लड़ने का ऐलान किया है।

तालिबान नई जगहों पर कब्जा जमाने के साथ ही अपनी सेना भी बढ़ाता जा रहा है। अफगानिस्तान से ऐसी खबरें आ रही हैं कि तालिबान जिन जगहों पर जीत रहा है, वहां बंद कैदियों को हथियार थमाकर अपने साथ जोड़ रहा है। वापस लौटते अमेरिकी सैनिक और तालिबान के हमले से भागती अफगानी सेना अपने पीछे बड़ी तादाद में हथियार छोड़ रही है, जिन पर तालिबान कब्जा जमा रहे हैं। कुछ समय पहले तक तो हालत ये बताई जा रही थी कि तालिबानों के पास लड़ाकों से ज्यादा हथियार हो गए थे। लेकिन अब तालिबान ने इस मोर्चे पर भी अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। पाकिस्तान से जैश और लश्कर के अलावा ब्रिटिश जिहादी भी तालिबान का हाथ मजबूत करने के लिए अफगानिस्तान पहुंच गए हैं। हालत ये है कि अब काबुल किसी भी समय तालिबान के कब्जे में आ सकता है।  

अफगानिस्तान के ये सूरतेहाल भारत के लिहाज से बिल्कुल ठीक नहीं है। देश की उत्तरी सरहद पर चीन और पाकिस्तान तो पहले से ही घात लगाए बैठे थे। अशरफ गनी सरकार के रहते भारत अफगानिस्तान को लेकर निश्चिंत रहता था, लेकिन तालिबान के आने से अब इस क्षेत्र में भारत-विरोधी एक तीसरा मोर्चा भी खुल सकता है। भले ही तालिबान कह रहा हो कि हिन्दुस्तानियों को उससे डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसकी हरकतें कुछ और ही इशारा कर रही हैं। हेरात प्रांत में सलमा डैम पर कब्जा और वहां के भारत समर्थक गवर्नर इस्माइल खान को सरेंडर के लिए मजबूर कर अपने पाले में लाकर तालिबान ने पर्याप्त संकेत दे दिए हैं कि आने वाले दिन कैसे होंगे? सलमा डैम न केवल अफगान और भारत सरकार की दोस्ती का एक बड़ा प्रतीक है, बल्कि ये अफगानिस्तान में भारत की सबसे महंगी परियोजना भी है। इसे मिलाकर भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में 22 हजार करोड़ रु पए निवेश किए हैं। अफगानिस्तान के संसद भवन और शहतूत डैम समेत कुल 500 छोटी-बड़ी परियोजनाओं में भारत ने निवेश किया है। सत्ता में तालिबान के आने का मतलब भारत के निवेश पर तलवार के लटकने जैसा होगा। भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान के देलारम तक की सड़क परियोजना पर भी काम कर रहा है। अगर अफगानिस्तान के रास्ते हमारा ईरान से संपर्क कट जाता है, तो चाबहार पोर्ट में निवेश हमारे किसी काम का नहीं रहेगा और मध्य यूरोप के साथ कारोबार की भारत सरकार की योजना पर भी पानी फिर सकता है।

इससे भी बड़ा खतरा सामरिक और रणनीतिक मोर्चे पर दिख सकता है। सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि तालिबान पाकिस्तान के उकसाने और उसके सहयोग से कश्मीर में हमारा सिरदर्द बढ़ा सकता है। तालिबान को इसके लिए खुद पीओके पार कर भारतीय सीमा में प्रवेश करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। वो ये काम कश्मीर की अलगाववादी ताकतों को सक्रिय करवा कर भी कर सकता है।

इधर पाकिस्तान और चीन दुनिया के लिए आपदा का रूप ले रहे इस खतरे में भी अवसर तलाश रहे हैं। परदे के पीछे से पाकिस्तान तालिबान को इसलिए सहयोग दे रहा है, ताकि ‘छींका फूटने’ पर वो तालिबान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सके। तालिबान के हथियारों पर मेड इन पाकिस्तान की मुहर का दावा उसकी साजिशों का सबसे ताजा खुलासा है। उधर, चीन तालिबान से इसलिए गलबहियों में जुटा है ताकि सीपेक प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाकर वो भारत के खिलाफ रणनीतिक बढ़त ले सके। शिनिजयांग में सक्रिय अलगाववादी संगठन और उइगर मुसलमानों को लेकर वो तालिबान के साथ एक समझौता करने में सफल भी हुआ है।

हालांकि पाकिस्तान और चीन, दोनों के लिए तालिबान को बढ़ावा देना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा भी हो सकता है। खासकर पाकिस्तान के लिए तो सुरक्षा के साथ-साथ इसका आर्थिक पक्ष भी है। इमरान सरकार को चुनौती तहरीक-ए-तालिबान से मिल सकती है, जिसे पाकिस्तानी तालिबान भी कहा जाता है और जिसका पाकिस्तान की सेना से टकराव जगजाहिर है। तहरीक-ए-तालिबान का अफगानिस्तान से लगते सरहदी इलाकों में खासा प्रभाव बताया जाता है। अफगान तालिबान मजबूत होंगे, तो टीटीपी का प्रभाव और हौसला, दोनों बढ़ेंगे। वो पाकिस्तान में अड्डा बनाए बैठे आतंकी संगठनों को पाकिस्तान के खिलाफ भी लामबंद कर सकता है। इससे एक तरफ पाकिस्तान की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी, वहीं दूसरी तरफ ग्रे लिस्ट से निकलने की कोशिशों पर झटका लगने से पहले ही खस्ताहाल पाकिस्तान और कंगाल हो जाएगा। उधर, चीन के लिए भी तालिबान की सनक को सहलाना मजबूरी बन सकता है, क्योंकि वो हमेशा शिनिजयांग में स्थिरता से लेकर अफगानिस्तान में चीन के भारी-भरकम निवेश के लिए खतरा बना रहेगा। इन सबके बीच अफगानिस्तान को लेकर अमेरिका समेत आतंक को नेस्तनाबूद करने की डींगें हांकने वाले कई देशों की बेपरवाही हैरान करने वाली है। अफगानिस्तान में जो कुछ हुआ है, उसके लिए यकीनन वहां की सरकार तो दोषी है ही, अमेरिका समेत नाटो में शामिल देश भी कम कसूरवार नहीं हैं। सेना की वापसी से लेकर तालिबान की ताकत का अंदाजा लगाने में इनका इंटेलिजेंस पूरी तरह फेल हुआ है।

हाल ही में अमेरिका ने एक खुफिया रिपोर्ट में कहा था कि तालिबान तीन महीने के अंदर राजधानी काबुल पर कब्जा कर सकता है, लेकिन तालिबान ने अमेरिकी सोच से कहीं पहले अफगान सरकार को पस्त कर दिया है। यहां तक भी ठीक था, लेकिन अब तालिबान को नियंत्रित करने के बजाय अमेरिका ने खुद को चुनिंदा हवाई हमलों तक सीमित कर लिया है, और अब वो कह रहा है कि अफगानिस्तान में कुछ भी करने के लिए बहुत देर हो चुकी है। उल्टे उसने दोहा में तालिबान प्रतिनिधि से विदेशी सहायता के एवज में अमेरिकी दूतावास पर हमला न करने की गारंटी ले ली है। जो हालात बन रहे हैं, उससे तो ये भी लग रहा है कि तालिबान 31 अगस्त तक अमेरिकी सेना की पूरी तरह से वापसी से पहले ही काबुल में अपना झंडा गाड़ देगा। शायद इसे ही देखते हुए बाइडेन प्रशासन ने अपने राजनयिकों को काबुल से निकालने के लिए आनन-फानन में अपने तीन हजार सैनिक अफगानिस्तान भेजने का फैसला किया है। गनी सरकार की तालिबान को बातचीत की पेशकश और अमेरिका की ये कार्रवाई इतना बताने के लिए काफी हैं कि अफगानिस्तान में ऊंट किस करवट बैठने जा रहा है। भारत के लिए अब यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि ऊंट की ये ‘करवट’ देश के माथे पर कितनी नई ‘सलवट’ लाती है?


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ

 
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