अफगानिस्तान काबुल से कबीलों की ओर

August 21, 2021

कहते हैं कि वक्त कहीं जाता नहीं, लौट-लौट कर आता रहता है। इतिहास की भी खुद को दोहराने की आदत है। और आज अफगानिस्तान वक्त और इतिहास का यही सितम झेल रहा है? देश एक बार फिर तालिबान के हवाले है। तख्तापलट के बाद राष्ट्रपति अशरफ गनी ने देश छोड़ दिया है। राजधानी काबुल पर तालिबान ने अपना कब्जा जमा लिया है। हालांकि उसने औपचारिक रूप से वहां के पूर्व प्रशासन की जगह अब तक नहीं ली है। इसके बावजूद अफगानिस्तान को इस्लामिक अमीरात का नाम देकर तालिबान ने वहां की अवाम पर अपने नियम-कायदे थोपना शुरू कर दिया है।

कुछ सरहदी इलाकों को छोड़कर राजधानी काबुल की सड़कों से लेकर एयरपोर्ट और समूचे अफगानिस्तान में अफरा-तफरी का माहौल है। वहां अब तक कम-से-कम चार हजार लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और तीन लाख से ज्यादा बेघर हो चुके हैं। जल्द कोई चमत्कार नहीं हुआ, तो हालत बद से बदतर होते जाएंगे। दुनिया के तमाम दावों के बावजूद साफ दिखाई दे रहा है कि अब अफगानिस्तान का अतीत ही उसका भविष्य बनने जा रहा है।

इस सबके बीच सवाल उठ रहा है कि अफगानिस्तान के वर्तमान का जिम्मेदार कौन है,  अफगान सरकार या तालिबान, या फिर अमेरिका? बेशक, इस सवाल का जवाब अब न तो अफगानिस्तान की तस्वीर बदलने में काम आ सकता है, और न ही उसकी तकदीर, लेकिन वैिक कूटनीति में ये गलतियों से सीखने वाला एक बड़ा सबक जरूर बन सकता है। केवल तीन महीने पहले तक अफगानिस्तान में सब कुछ सामान्य था। अनुमान लगाना भी कल्पना से परे था कि अफगानिस्तान के आम नागरिक की सुरक्षा से लेकर अमेरिका के प्रथम नागरिक वहां के राष्ट्रपति जो बाइडेन के रसूख पर इतनी जल्दी खतरे के बादल घिर आएंगे। लेकिन ऐसा हुआ और अब तो बाइडेन पर दुनिया भर से आरोपों की बौछार हो रही है। सफाई में बाइडेन दलील दे रहे हैं कि अफगान सरकार ने बिना लड़े सरेंडर कर दिया और उसके मुखिया अशरफ गनी तालिबान को आंख दिखाने के बजाय पीठ दिखाकर भाग गए। कुछ दिनों तक तो गनी की कोई खबर भी नहीं मिली, फिर पता चला कि ‘मानवता’ के नाते संयुक्त अरब अमीरात ने उनको शरण दी है।

अमेरिका को तो जाना ही था
आखिर, अमेरिका भी कब तक अफगान सरकार को अपनी सैन्य सेवाएं दे सकता था? बेशक, ये सवाल पूछना अमेरिका का हक है, एक-न-एक दिन तो ये होना ही था, लेकिन फिर अमेरिका को ये जवाब भी देना होगा कि क्या सेना की वापसी का निर्णायक कदम उठाने में उससे कहीं कोई बड़ी चूक हो गई? अगर उसे अफगान सेना पर भरोसा था तो वो अब शत-प्रतिशत गलत साबित हो चुका है और अगर भरोसा नहीं था, तो अफगानिस्तान को तालिबान के भरोसे छोड़ आना कितना जायज था? यकीनी तौर पर ये बड़ी चूक है, वरना अपने राजनयिकों और अन्य नागरिकों को अफगानिस्तान से निकालने के लिए अमेरिका को आनन-फानन में अपने तीन हजार सैनिक नहीं भेजने पड़ते, सब कुछ पहले से तय 31 अगस्त की डेडलाइन के हिसाब से ही होता।

अब अंदेशा है कि अमेरिका की इस गलती की सजा केवल अफगानिस्तान ही नहीं भुगतेगा, बल्कि पूरी दुनिया इससे प्रभावित होगी। बदले सूरतेहाल में दक्षिण-पूर्व एशिया में इस्लामी कट्टरवाद को नई ऊर्जा मिल सकती है। तालिबान ने अफगानिस्तान को शरिया कानून के अनुसार चलाने का जो ऐलान किया है, उसने वहां 1996 के दौर की यादें ताजा कर दी हैं, जब हत्या-चोरी के दोषियों को सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी जाती थी, उनके हाथ-पैर काट कर छोड़ दिया जाता था। पुरु षों पर दाढ़ी रखने का और महिलाओं को बुर्के में कैद रहने का दबाव बना रहता था। दस साल से ज्यादा उम्र की लड़कियां स्कूल नहीं जा सकती थीं और तालिबान जब चाहे महिलाओं और जवान लड़कियों को उनके घर से उठा लिया करते थे। कबीलों से दोबारा काबुल तक पहुंचे तालिबान अफगानिस्तान की सड़कों पर जिस तरह की बर्बरता दिखा रहे हैं, उसमें आने वाले दिनों में उनकी हुकूमत के तौर-तरीकों की झलक साफ दिखाई दे रही है।

आने वाले दिनों में अगर अफगानिस्तान दुनिया का नया आतंकिस्तान बनता है, तो कश्मीर के नजरिए से ये भारत के लिए भी बड़ी चिंता का विषय बनेगा। पाकिस्तान की सरपरस्ती में पल रहे जैश और लश्कर ने तालिबान को उसकी लड़ाई में मदद की है। पाकिस्तान इसके एवज में कश्मीर में अस्थिरता लाने के लिए तालिबान के कंधे का इस्तेमाल कर सकता है। केवल अपनी सीमाओं की सुरक्षा के नजरिए से ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता की वजह से भी भारत से उम्मीदें बढ़ गई हैं। खासकर अमेरिका के कदम पीछे खींच लेने और उसकी विरोधी चौकड़ी पाकिस्तान-चीन-रूस और ईरान की अफगानिस्तान में बढ़ती सक्रियता ने भी भारत की जिम्मेदारी बढ़ा दी है।

भारत की ‘वेट एंड वॉच’ नीति
अफगान संकट को लेकर भारत अब तक ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में रहा है। गुरु वार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विदेश मंत्री के संबोधन से भी आगे की राह कोई खास स्पष्ट नहीं हुई है। हालांकि उन्होंने आतंकवाद को संरक्षण देने को लेकर परोक्ष रूप से चीन और पाकिस्तान को आड़े हाथों जरूर लिया। यूएनएससी अध्यक्ष के रूप में भारत से उम्मीद की जा रही है कि वो अफगानिस्तान में शांति सेना उतारने की पहल करे। हो सकता है कि शांति सेना अफगानिस्तान में शांति लाने में कामयाब हो जाए, लेकिन इसके लिए सबसे बड़ी अड़चन तो इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र से पास करवाने में ही आएगी। इसके लिए पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी जरूरी होगी। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस इसके लिए तैयार हो भी जाते हैं, तो चीन-रूस इसमें पेंच फंसा सकते हैं। इसलिए इस प्रस्ताव का गिरना लगभग तय है।

संकट सुलझाने का व्यावहारिक विकल्प
तो फिर इस संकट को सुलझाने का व्यावहारिक विकल्प क्या हो सकता है? अब तक अफगानिस्तान में एयर स्ट्राइक कर रहे अमेरिका ने तालिबान पर आर्थिक स्ट्राइक करने का फैसला किया है। अमेरिका ने अपने बैंकों में रखी अफगान सरकार की 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति फ्रीज कर दी है और अफगानिस्तान जा रहे नकदी के एक शिपमेंट को रोक दिया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी अमेरिका के सुर में सुर मिलाते हुए अफगानिस्तान को दिए जाने वाले 460 मिलियन डॉलर यानी करीब 3,400 करोड़ रु पए के इमरजेंसी फंड पर रोक लगा दी है। लेकिन इस तरह के आर्थिक प्रतिबंधों से देर-सबेर अफगान की आम जनता की ही परेशानी बढ़ेगी। कोई भी पुख्ता हल बातचीत के बिना नहीं निकलेगा, लेकिन इसके लिए तालिबान को बातचीत की टेबल पर लाने से पहले उसके लिए संवेदना दिखा रहे चीन, पाकिस्तान, रूस और ईरान जैसे देशों को तैयार करना होगा कि वो तालिबान पर दबाव बना सकें।

हालांकि लगता है कि तालिबान ने खुद इसकी शुरु आत कर दी है। तालिबान राजकाज में चाहे कितना भी कच्चा हो, लेकिन पिछले बीस साल से अमेरिका से लड़ते-लड़ते उसने कूटनीति का ककहरा तो सीख ही लिया है। उसके नेताओं को ये बात अच्छे से समझ आती है कि अकेले उनके नेतृत्व में बनी सरकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलना तो दूर की बात है, अफगानिस्तान की जनता भी उसे कबूल नहीं करेगी। इसलिए उन्होंने पुराने अफगानी नेताओं, हाई पीस काउंसिल, मुजाहिद्दीनों को साथ मिलाकर तालिबानी राष्ट्रपति की अगुवाई में एक साझा सरकार बनाने की नीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इस योजना को लेकर तालिबानी नेता अनस हक्कानी, पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई, हाई पीस काउंसिल के डॉ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला और पूर्व मुजाहिद्दीन नेता गुलबुद्दीन हिकमतयार से मुलाकात भी कर चुका है।

सालेह के रुख पर बहुत कुछ निर्भर
हालांकि इस योजना की सफलता देश के प्रथम उपराष्ट्रपति अमरु ल्लाह सालेह के आगे के रुख से ही तय होगी। सालेह ने तालिबान के खिलाफ पंजशीर इलाके में बगावत का बिगुल फूंक दिया है और खुद को अफगानिस्तान का नया राष्ट्रपति घोषित करते हुए तालिबान से कुछ इलाके भी छीन लिए हैं। सालेह पाकिस्तान-तालिबान गठबंधन के खिलाफ हैं और उनकी स्पष्ट मान्यता है कि अफगानिस्तान इतना छोटा नहीं है कि पाकिस्तान उसे निगल जाए और इतना बड़ा है कि तालिबान उसे चला नहीं सकते।

बहरहाल, अफगानिस्तान जिस दिशा में जा रहा है, वो भारत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है और भविष्य में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। दिक्कत की बात ये है कि भारत के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। वैसे असलियत तो ये है कि तालिबान हो या कोई और आतंकी समूह, उससे निपटने के लिए एकाकी नहीं, बल्कि सामूहिक कोशिशों की जरूरत पड़ सकती है। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बड़ी दिलचस्प और सार्थक टिप्पणी की है। उन्होंने आतंकवाद की तुलना कोरोना महामारी से की है और कहा है कि दुनिया हमेशा याद रखे कि कोविड के बारे में जो सच है, वही आतंकवाद के बारे में भी सच है। हममें से कोई भी तब तक सुरक्षित नहीं है, जब तक कि हम सभी सुरक्षित न हों। अफगान संकट सुलझाने के लिए इससे बेहतर मंत्र और क्या हो सकता है?
 


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ

 
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