आज है वट सावित्री व्रत, जानें पूजा की मान्यताएं और इसका महत्व

May 22, 2020
- वार्ता

वट सावित्री व्रत महिलाएं द्वारा अखण्ड सौभाग्य की कामना के साथ मनाती हैं। इस साल वट सवित्रि व्रत शुक्रवार 22 मई के दिन है।

भारतीय समाज वट वृक्ष का आदर करता है। इसके पीछे भले ही धार्मिक मान्यताएं हों, लेकिन उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण का ही जान पड़ता है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्राचीन काल से ही पूर्वज जागरूक और सक्रिय रहे है यही कारण है कि वृक्षों को धार्मिक आस्था से जोड़ कर त्यौहार और व्रत रहने की परम्परा है। पूर्वजो द्वारा वृक्षों के पूजा के साथ ही साथ उनका संरक्षण प्राथमिकता से किया जाता था। देश में वट सावित्री व्रत अखण्ड सौभाग्य के लिए महिलाओं द्वारा मनाया जाता है।

इस साल सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तदनुसार 22 मई को वट साबित्री व्रत महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए रखेगी।

इस व्रत में ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिन का उपवास रखा जाता है कुछ स्थानों पर मात्र एक दिन अमावस्या को ही उपवास होता है। यदि तीन दिन व्रत करने का सामथ्र्य ना हो तो त्रयोदशी के दिन एक भुक्त व्रत, चर्तुदशी को अयाचित व्रत और अमावस्या को उपवास करना चाहिए।ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन उपवास के साथ ही वट सावित्री की व्रत कथा सुनने से सौभाग्यवती स्त्रियों का सौभाग्य अखंड होता है तथा उनकी मनोकामना पूर्ण होती है।

इस दिन सूर्योदय प्रातः 5.19 बजे और अमावस्या रात्रि 1.30 बजे तक है। यह व्रत साबित्री द्वारा अपने पति को पुनः जीवित करने की स्मृति के रूप रखा जाता है।

भारतीय जनमानस में व्रत और त्योहार की विशेष महत्ता है। देशभर में धार्मिक और वैज्ञानिक कारणों से व्रत और त्योहार मनाये जाते है। प्राचीनकाल से भारत वर्ष में प्रत्येक माह कोई न कोई व्रत त्योहार मनाया जाता है। उसी में से एक वट सावित्री व्रत अखण्ड सौभाग्य तथा पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा के लिए मनाया जाता है। वट सावित्री व्रत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस्या तक उत्तर भारत में और ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में इन्हीं तिथियों में वट सावित्री व्रत दक्षिण भारत में मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत का महत्व:
जेठ की अमावस्या पर बरगद की पूजा होती आ रही है। वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री को अपना सुहाग वापस मिला था। इस पूजा का महत्व जीवन चक्र से जुड़ चुका है। यदि धरती को बचाना है तो बरगद व पीपल के अधिक से अधिक वृक्ष लगाने होंगे। कहावत है कि पीपल में ब्रह्म देव व बरगद में भगवान भैरों का निवास रहता है। इसलिए देवताओं का वास मानकर वृक्षों की पूजा की जाती है।

धर्मग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है कि पीपल के पत्तों में देवी देवता वास करते हैं। इसे ऋषि, मुनियों की दूरदृष्टि ही कहेंगे कि उन्हें आने वाले समय की परेशानियां पता थीं। शायद इसी के चलते उन्होंने इन वृक्षों को धार्मिक महत्व से जोड़ दिया, ताकि ये संरक्षित रहें।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी पीपल व बरगद के वृक्ष अन्य की अपेक्षा सर्वाधिक ऑक्सीजन देते हैं। बारिश में दोनों ही वृक्ष अपनी जड़ों से वर्षा का जल भी सर्वाधिक संरक्षित करते हैं।

धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान श्रीराम एवं द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पेड़ों की पूजा करने के उदाहरण मिलते है। वनस्पति विज्ञान की रिपोर्ट के अनुसार यदि बरगद के वृक्ष न हों तो ग्रीष्म ऋतु में जीवन में काफी कठिनाई होगी।

वट वृक्ष में होता है भगवान के कई रूपों का वास:
वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष जिसका अर्थ है बरगद का पेड़, का खास महत्व होता है। इस पेड़ में लटकी हुई शाखाओं को सावित्री देवी का रूप माना जाता है। वहीं पुराणों के अनुसार बरगद के पेड़ में त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास भी माना जाता है। इसलिए कहते हैं कि इस पेड़ की पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

इस वृक्ष को देव वृक्ष माना जाता है वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी का, तने में भगवान विष्णु का तथा डालियों एवं पत्तियों में भगवान शिव का निवास कहा जाता है। इसके साथ ही अक्षय वट वृक्ष के पत्ते पर ही भगवान श्रीकृष्ण ने मार्कंडेय ऋषि को दर्शन दिए थे यह अक्षय वट वृक्ष प्रयाग में गंगा तट पर वेणीमाधव के निकट स्थित है।

सौभाग्यवती महिलाएं अपने अखण्ड सौभाग्य के लिए आस्था और विश्वास के साथ व्रत रहकर पूजा अर्चना करती है।


 
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