दिव्य चिंगारी

February 12, 2021

हम सभी के भीतर एक दिव्य चिंगारी छिपी हुई है। विस्मयकारी सौंदर्य के मंडल, अकल्पनीय दृश्य और ध्वनियां, असीम विवेक और पूर्ण रूप से आलिंगित करता प्रेम हमें अंतर में आमंत्रित करते हैं।

दिव्य ज्योति निरंतर प्रकाशित रहती है। हम इसकी खोज अधिकतम दूरी पर स्थित संसारों में या एटम के न्यूनतम र्तको में करते हैं। किंतु इसके रहस्य हमारे भीतर छिपे रह जाते हैं। मानव के उद्गम को जानने के, वैज्ञानिक दूरबीनों के जरिए समस्त ब्रह्मांड को निहारने पर या पार्टिकल एक्सीलिरेटर्स द्वारा परमाणु का खंडन करके ‘परमात्मा-कण’ ढूंढने पर विशाल धनराशि खर्च करते हैं। अन्य व्यक्ति विश्व के विभिन्न धर्मो के कर्मकांडों द्वारा प्रभु को पाने का प्रयास करते हैं। फिर भी, अधिकांश लोगों के लिए प्रभु एक रहस्य बना हुआ है। हमारे भीतर एक ज्वाला विद्यमान है, जो हमारे जीवन में कायाकल्प कर सकने की सामथ्र्य रखती है। एक ज्योति है, जो हमें विवेक, शात सुख, पूर्ण प्रेम, निर्भयता तथा अमरत्व दे सकती है। यह ज्वाला हमारे हृदय और मन को आलोकित करती है और ऐसे प्रश्नों के उत्तर दिलाती है, जिनसे मानवता युगों-युगों से जूझती आई है, जैसे कि हम यहां क्यों आए हैं? हम कहां से आए हैं? मृत्योपरान्त हम कहां जाएंगे? वैज्ञानिकों की भांति हम इनके उत्तरों को तारों से भरे आसमान में और परमाणु के अंदर ढूंढते रहते हैं।

हम इनके उत्तरों को धर्मस्थानों, धर्मग्रंथों, ओर तीर्थस्थानों में भी ढूंढते रहते हैं। परंतु इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए हमें कहीं बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है; यह ज्वाला हम सबमें विद्यमान है। जब हम उस धधकते अंगारे को खोज लेते हैं, तो हम अंतर के अचरजों को देखने वाले बन जाते हैं और सौंदर्य, असीम प्रेम, अविरल तथा अकथनीय हषरेन्माद का अनुभव करने लगते हैं। शात धूप का आनंद लेने के लिए हमें अपने भीतर झांकना होगा। ध्यानाभ्यास द्वारा हम आंतरिक ज्योति तथा श्रुति को देख व सुन सकते हैं। इस धारा में लीन होने पर हमें चेतनता के आत्मिक मंडलों का अनुभव होता है। ध्यानाभ्यास की इस विधि को सभी धर्मो, देशों, व संस्कृतियों के व्यक्ति अपना सकते हैं। इसके लिए किन्हीं कठोर आसनों या मुद्राओं की आवश्यकता नहीं है। इस आरामदेह अवस्था में बैठकर अपनी आत्मा की शांत गहराइयों में अद्भुत ज्योतिर्मय आंतरिक दृश्यों का अनुभव करते हैं।




 
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