अब हिसाब मांग रहे हैं लोग

December 23, 2012

दिल्ली गुस्से में है. गुस्सा अब सड़कों पर दिख रहा है. न्यूज चैनल्स और अखबारों के जरिए यह गुस्सा देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंच रहा है.

16 दिसम्बर की रात को दिल्ली की सड़कों पर एक 23 साल की लड़की के साथ जो हुआ, उसकी निंदा के लिए शब्द कम पड़ जाएंगे. इस जघन्य घटना के बाद लोगों का गुस्सा जायज है. और सब जगह एक ही प्रतिक्रिया है- महिलाओं के प्रति हो रही अमानवीय घटनाएं जल्दी से बंद हों.

गुस्सा सरकार के प्रति है, पुलिस-प्रशासन के प्रति है और उस मानसिकता के प्रति है जिसमें महिलाओं को सामान समझा जाता है. लोगों का गुस्सा देखकर नेताओं के सुर बदले हुए हैं. संसद में बहस हुई और कई सांसदों ने यह मांग भी की कि बलात्कारियों को फांसी की सजा होनी चाहिए. कुछ सांसद भावुक हो गए. सरकार की ओर से भरोसा भी मिला कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. यह भी भरोसा दिलाया गया कि पीड़िता के इलाज में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी.

लेकिन लोगों का गुस्सा न थम रहा है और न घट रहा है. सड़कों पर हजारों लोग आकर प्रदर्शन कर रहे हैं और यह आक्रोश फैलता ही जा रहा है. तो क्या सरकार के वादों पर लोगों को भरोसा नहीं है? क्या इस तरह की घटना फिर से न हो जाए, इसका डर लोगों को सता रहा है? वादों पर से भरोसा तो उठा ही है, ऊपर से लोगों को डर भी सता रहा है. नेता संसद में कुछ कहते हैं और चुनाव के समय कुछ और करते हैं. एक अंग्रेजी अखबार में दो रिपोर्ट छपी हैं जिनसे साफ होता है कि नेताओं के वादों पर लोगों को भरोसा क्यों नहीं हो रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक संसद में नेता बलात्कारियों को फांसी की सजा देने की मांग करते हैं, लेकिन चुनाव में बलात्कार के आरोपियों को टिकट देने से परहेज नहीं करते हैं. दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक हाल के दिनों में चार बलात्कारियों की फांसी की सजा कम कर दी गई. आंकड़े बताते हैं कि आपराधिक मामलों को सुलझाने को लेकर पूरे देश में पुलिस का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है. आरोपी पकड़े जाते हैं लेकिन पुलिस की जांच में इतनी धार नहीं है कि उनको सजा मिल जाए. लोगों का भरोसा इसकी वजह से भी टूट रहा है.

दूसरा मसला लोगों के डर का है. यह डर उन छिछोरों और उन गुंडों से है जिनके लिए नारी एक शिकार है. पुलिस का खौफ कहीं है ही नहीं. आवारा लोगों की जमात पर यह खौफ होना चाहिए कि उनकी छोटी सी हरकत भी उन्हें जेल पहुंचाएगी, तब सुरक्षा का यह घेरा कायम होगा. मेरा मानना है कि अपराधियों को पकड़ा जाएगा, कुछ को सजा भी हो जाएगी, लोगों के गुस्से को देखते हुए पुलिस व्यवस्था भी थोड़ी चुस्त हो जाएगी. लेकिन क्या इतने भर से बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में कमी आ पाएगी? इसके लिए बहुत कुछ बदलना होगा.

बदलाव की शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी. हिंसा, मानसिक कीड़ा है, जिसे न तो समाज देखता है और न ही पुलिस मॉनिटर कर सकती है. जो हिंसक हो गए हैं, जो अपना आपा खो चुके हैं, उनको तो कानून का डंडा ही सीधा कर सकता है. लेकिन आने वाली पीढ़ी को तो हम सुधार सकते हैं. इसके लिए हमें किसी से कुछ सीखना नहीं है. हमारी सांस्कृतिक धरोहर इतनी समृद्ध है कि आने वाली पीढ़ी को उसका दर्शन भर करा देने से मानसिक हिंसा को कम किया जा सकता है.

हमें अपने बच्चों में अपनी ही संस्कृति के अच्छे मूल्यों को भरना होगा. हमारी संस्कृति में मां को देवी माना जाता है, जननी कहा जाता है. जितने देवताओं को पूजा जाता है उतनी ही देवियों को. मां को शक्ति-स्वरूपा माना जाता है. यही वजह है कि जिन इलाकों में संस्कृति की धरोहर को अब भी समेट कर रखा गया है वहां बलात्कार या घरेलू हिंसा की घटनाएं कम होती हैं. महिलाओं के खिलाफ सभी तरह के अत्याचार के खिलाफ घर से ही माहौल बदलेगा. घर बदलेगा तो समाज बदलेगा और तभी मोहल्ला और शहर या देश बदलेगा. हमारे अपने घर में महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हों, जिल्लत की जिंदगी जी रही हों तो हम अपने समाज के बेहतर होने की कल्पना कैसे कर सकते हैं?

इसके अलावा सरकार को और समाज के दूसरे घटकों को इस बात का जोर-शोर से प्रचार करना होगा कि बलात्कार करने वालों को किस तरह की सजा मिलती है. अभी हालत यह है कि बलात्कारी पकड़े नहीं जाते हैं. पकड़े भी गए तो सबूत के अभाव में ज्यादातर आरोपी छूट जाते हैं. इसमें अगर सुधार नहीं किया गया तो इस तरह के घिनौने मामले होते रहेंगे. कानून का डर पैदा करने के लिए जरूरी है कि कानून के रखवाले अगर पूरी तरह से कार्यकुशल नहीं हो सकते हैं तो कम से कम संवेदनशील हों.

दिल्ली के इंडिया गेट पर जुटी लड़कियों की ओर से बार-बार यह बयान आ रहा है कि उन्हें जितना डर बलात्कारियों से लगता है, उतना ही डर पुलिस से भी लगता है. जिस देश में पुलिस की छवि ऐसी हो तो फिर वहां कानून व्यवस्था कैसे कायम हो सकती है? पुलिस से देश के कानून मानने वाले नागरिक डरते हैं, लेकिन कानून तोड़ने वालों को इसका खौफ ही नहीं है. यह कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है. यह शासन की समस्या है, जिसे अगर ठीक नहीं किया गया तो लोगों का गुस्सा अब इसी तरह से सामने आता रहेगा.

पुलिस व्यवस्था के तौर-तरीके वही हैं जो 100 साल पहले अंग्रेजों के जमाने में होते थे. अपराध की घटना घटी, किसी को पकड़ लो, उसे डंडे मारकर अपराध कबूल करवा लो. कोर्ट में आरोप साबित होगा या नहीं, इसकी कोई परवाह नहीं. इस व्यवस्था में निर्दोष खौफजदा रहते हैं, जबकि अपराधी बेखौफ घूमते हैं. जब तक यह ढर्रा नहीं बदलता, तब तक निर्दोष लोगों को गुस्सा आता रहेगा, कानून माने वाले नागरिक डरते रहेंगे और घिनौने अपराध भी रुकने से रहे.

पुलिस रिफॉर्म की जब भी बात होती है तो रिफॉर्म के नाम पर पुलिस को और पावर दे दिया जाता है. पुलिस को ज्यादा पावर देना रिफॉर्म नहीं है. उसके पावर को जिम्मेदारी और जवाबदेही से जोड़ना रिफॉर्म है. लेकिन इसकी कोई चर्चा ही नहीं होती है. क्या इस तरह के रिफॉर्म से कुछ सुधरेगा? मेरे खयाल से जनता जनार्दन के गुस्से के आगे अब किसी की नहीं चलने वाली है. लोग हिसाब मांग रहे हैं. खुद से जुट रहे हैं और खुद ही आंदोलन की दिशा तय कर रहे हैं. लोकतंत्र की आड़ में आंदोलन का ठेका लिए बैठे सारे राजनीतिक दल हतप्रभ हैं, लेकिन अपनी प्रासंगिकता साबित नहीं कर पा रहे हैं.

ऐसा अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी दिखा और अब भी दिख रहा है जो बताता है कि हमारे राजनीतिक दल और उनका नेतृत्व देश को अपनी जागीर मानता है. वे मानते हैं कि सरकार और विपक्ष ही देश को चला रहे हैं और दोनों अपनी कुर्सी एक अंतराल पर बदलते रहें लेकिन तीसरा उसमें न घुसे. जनता क्या चाहती है, यह तय करने का ठेका सरकार और विपक्ष ने ले रखा है. दोनों एक-दूसरे की तरह बर्ताव करते हैं. यह गुस्सा पार्टियों की विफलता है, जो जनभावना के अनुरूप व्यवहार नहीं कर रही हैं.

दोषियों को सजा दिलाने भर से पीड़ितों का घाव भर जाएगा? हमें उनके लिए भी सोचना होगा और रास्ता निकालना होगा, जिससे उनकी मर्यादा पर कोई आंच न आए और वे अपनी जिंदगी के सफर पर ऊंचे मनोबल के साथ बढ़ सकें. उनकी सम्मानजनक जिंदगी की गारंटी समाज के ही हाथ में है. हम इतना तो कर ही सकते हैं.
 


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ

 
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