नजरिया : चलिये ऑड-इवन के साथ

April 17, 2016

पिछली बार पहली जनवरी से 15 जनवरी तक दिल्ली में ऑड-इवन नम्बर-प्लेटों की गाड़ियां अलग-अलग दिनों सड़कों पर निकलने लगीं तो करीब एक सप्ताह तक सबको ऐसा लगा जैसे जिंदगी किस कदर अस्त-व्यस्त हो गई है.

लेकिन दूसरे सप्ताह में सड़कों पर कम प्रदूषण और कम वाहनों के चलते गाड़ी में बैठने और गाड़ी चलाने का जो मजा आया कि ऑड-इवन फॉर्मूले के बंद होने के बाद वह तकलीफ में बदलने लगा.

इस बीच, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मैंने जितनी बार याद किया उतना शायद उनके बड़े आंदोलन करने या आमरण अनशन पर बैठने के दिनों में भी नहीं किया होगा या उनके काम की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया होगा. लेकिन ऑड-इवन का मजा लेने के बाद अनेक बार पूर्व निर्धारित मीटिंगों में देर से पहुंचने के कारण मुझे शर्मिदा भी होना पड़ा. तब मैंने बहुत शिद्दत से मन ही मन केजरीवाल का शुक्रिया अदा किया कि उन्होंने नागरिकों के लिये वे 15 दिन इतने सुंदर बनाये थे पर अगले तीन महीने उतने सुंदर या सुविधाजनक नहीं रह गए.

बेशक केजरीवाल की पहल की सराहना की जानी चाहिए. हम सभी भारतवासी या भारत में जन्म लेने वाले सभी लोग ऑड-इवन का दर्शन बचपन से ही सीख कर बड़े होते हैं. यह पूरा जीवन साथ चलता है. फिर शिक्षण संस्थान हो या कार्यस्थल या उसके आसपास तमाम ऑड-इवन सोच वाले साथ-साथ रहते या काम करते हैं. इनके बीच हमें सामंजस्य बिठा कर रहना या काम करना पड़ता है.

हम 24 घंटे में जितना समय अपने परिवार के लोगों के बीच नहीं बिता पाते, उससे ज्यादा समय ऑड-इवन सोच रखने वाले के साथ बिताना पड़ता है. और हम ऐसा इसलिए करते हैं कि कार्यस्थल जिम्मेदारी के साथ-साथ जवाबदेही भी होता है. और निरंतर उत्पादक परिणाम देने की मजबूरी भी होती है. इसके सिवाय और कोई दूसरा विकल्प भी नहीं होता है. भले ही जीवन में सुख-दुख के चक्र में यह होता ही रहता है, तो ऐसा नहीं कि हम सब ऑड-इवन से परिचित ही नहीं हैं क्योंकि सभी के जीवन में ऑड-इवन किसी न किसी रूप में शामिल है.

अब तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि अभिभावक अपने बच्चों के जन्म लेने का ऑड-इवन डेट भी अपनी सुविधा से तय कर लेते हैं. देखें तो ऑड-इवन हमारे जीवन के विभिन्न संस्कारों व रीति-रिवाजों तक में रचा-बसा है. खरमास, पितर पक्ष (शुभ कामों के लिए वर्जित मास) या शुभ-लग्न के रूप में, विवाह आदि का शुभ मुहूर्त भी ऑड-इवन तिथियों के आधार पर निकाला जाता है. इन सबके बावजूद मुझे इसका भान था कि केजरीवाल के दिल्ली में ऑड-इवन लागू करने के फैसले का जबर्दस्त विरोध होगा. इस विरोध के पीछे की मानसिकता को समझना मुश्किल नहीं है.

दरअसल, हम अपने जीवन में बनी-बनाई व्यवस्था में इतने आराम से जी रहे होते हैं कि यह सोचने मात्र से ही तनाव होने लगता है कि इवन के दिन ऑड नम्बर की गाड़ी का इस्तेमाल कैसे करें या पब्लिक ट्रांसपोर्ट की धक्का-मुक्की के बीच सफर कैसे करें? मैं अपने जैसे ही उन करोड़ों भारतीयों के मनोवैज्ञानिक पहलू को समझते हुए कहना चाहूंगा कि अमेरिका या यूरोप में औसत हर आदमी 10-12 किलोमीटर अपनी मस्ती में पैदल चलता है. हम लोग भी जब छुट्टियां बिताने या अपने ऑफिसियल काम के चलते उन देशों में जाते हैं तो काफी पैदल चलते हैं और उसका आनंद लेते हैं. मैंने खुद लंदन में अनेकों भारतीय उद्योगपतियों और मंत्रियों को बेहिचक ट्यूब ट्रेन में सफर करते देखा है.

पिछले साल मैं न्यूयार्क की यात्रा पर था. वहां पर मैं प्रतिदिन करीब 15 किलोमीटर से ज्यादा पैदल चल लेता था. पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी मैंने भरपूर उपयोग किया. यहां यह सवाल उठता है कि हमारे पब्ल्कि ट्रांसपोर्ट इतने सुविधाजनक, समयबद्ध या स्तरीय नहीं हैं? लेकिन दिल्ली मेट्रो की बात की जाए तो दुनिया के किसी भी मेट्रो से उसकी तुलना की जा सकती है.

अगर बस या टैक्सी की बात की जाए तो कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद दिल्ली में एसी और नॉन-एसी बसों की फ्लीटें चलाई गई, उनकी तुलना एक दो देशों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर देशों के साथ की जा सकती है. दरअसल, खराबी हमारे मन-मस्तिष्क में ही है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट में इस्तेमाल की जाने वाली चीजों को सहेज कर रखने की आदत हमने डाली नहीं है. बसों की सीटें फाड़ देना, गंदगी फैला देना या फैली गंदगी को नजरअंदाज करके आगे बढ़ जाना; इस मानसिकता को दर्शाता है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट में इस्तेमाल की जाने वाली चीजों को हमने कभी अपना समझा ही नहीं.

भारत के मुख्य न्यायाधीश ने जब अपने सहयोगी जजों के साथ कार-पूल करके आना-जाना शुरू किया, तब शीर्ष अदालत के शीर्ष व्यक्ति ने ऑड-इवन पर अपनी स्वीकारोक्ति कुछ इस पुख्ता अंदाज में दी, जिससे दिल्ली में ऑड-इवन को समर्थन मिला और तीन माह बीतते-बीतते हर दूसरे आदमी ने यह कहना शुरू कर दिया कि दिल्ली में इसे लागू करना अब जरूरी हो गया है. हवा में खतरनाक प्रदूषण और सड़कों पर घंटों इंतजार करना तब अच्छा लगता था क्योंकि विकल्प नहीं था.

सच्चाई यह है कि अगर सोच-समझ कर खूबसूरती से अपने दिन-भर के कार्यक्रमों को निर्धारित कर लिया जाए तो एक गाड़ी रखने वाला व्यक्ति भी बहुत खूबसूरती के साथ अपने सारे काम निबटा सकता है. बस जरूरत है तो चुस्त-दुरुस्त प्लानिंग की. ऑड-इवन फामरूले की खूबी-खामी की बहुत चर्चा हो चुकी है. लेकिन यह बेहिचक कहा जा सकता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भारत की पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में एक नये युग का सूत्रपात किया है. इसके लिए वे बेशक बधाई के पात्र हैं.

जरूरत इस बात की है कि थोड़ी बेहतरीन सुविधाओं के साथ बसों की नई फ्लीट सड़कों पर उतारी जाए. इससे वाहन न रखने वाले लोगों को परेशानी नहीं होगी. वे खुशी-खुशी ऑड-इवन की सफलता में भागीदार बनने के लिए राजी हो जाएंगे. जब ऑड-इवन की शुरुआत हुई थी तब दिल्ली के लोगों को यह नाहक की जहमत लगता था, लेकिन आज जरूरी लगने लगा है.

अब तो दिल्ली की देखा-देखी अन्य महानगरों और छोटे शहरों में भी ऑड-इवन अपनाने पर चर्चाएं होने लगी हैं. देखा जाए तो ऑड-इवन के जरिये अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में सामाजिक क्रांति भी ला दी है. पहले पड़ोसियों को एक दूसरे के गंतव्य स्थान का पता नहीं होता था, लेकिन अब कार-पूल करके जाने-आने की निर्भरता के चलते पड़ोसियों को एक-दूसरे के बारे में जानकारियां रहने लगी हैं. इससे निश्चित रूप से सामाजिक सहभागिता तथा समरसता भी बढ़ी है. इसका भी श्रेय केजरीवाल को जाता है.


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ

 
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