नजरिया : एजेंसियों के लिए सबक है हसन अली

April 24, 2016

दो सप्ताह पहले मुंबई से छपने वाले एक अखबार में पुणे के व्यवसायी हसन अली खान के बारे में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल का जो आदेश आया है, वह काफी चौंकाने वाला है.

आईटीएटी ने हसन अली खान के ऊपर सिर्फ दस करोड़ रुपये की डिमांड को ही जायज ठहराया है. बाकी हसन अली खान के ऊपर एक लाख पच्चीस हजार करोड़ रुपये का टैक्स चोरी का मामला चल रहा था, उसे तथ्यों और साक्ष्यों के अभाव में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने इस डिमांड को आधारहीन बताया है. सवाल यह उठता है कि 5 जनवरी, 2007 को जब हसन अली खान पर आयकर विभाग ने उसके मुंबई और पुणे के आवास पर छापेमारी की तब हजारों करोड़ रुपये और स्विस बैंक खातों का एक बड़ा जाल निकलकर सामने आया था और 6 जनवरी, 2007 को आयकर अधिकारियों ने प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों को भी इस छापेमारी में शामिल कर लिया था.

प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग के अधिकारी अनेक बार स्विट्जरलैंड इस जांच के सिलसिले में गए और आए भी. पता चला था कि हसन अली खान का जो खाता स्विस बैंक की सिंगापुर ब्रांच में खोला गया था, उसमें इंट्रोड्यूसर की भूमिका हथियारों के बहुत बड़े पैमाने पर कारोबार करने वाले व्यवसायी अदनान खसोगी ने की थी. यह भी स्पष्ट था कि जिन खातों से हसन अली खान पैसा निकलवाना चाहते थे, वे खाते बहुत पहले खोले गए थे, लेकिन हसन अली के अपने खातों से भी 68 करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ था. स्विस बैंक में चल रहे उन तमाम खातों की जांच-पड़ताल के बाद प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग के अधिकारी इस नतीजे पर पहुंचे थे कि हसन अली खान पर करीब एक लाख 25 हजार करोड़ रु. की डिमांड खड़ी की गई.

हालांकि हसन अली खान शुरू से ही इन तमाम तथ्यों को नकारता रहा, लेकिन देश के इतिहास में इतनी बड़ी डिमांड शायद पहली बार किसी एक व्यक्ति के नाम पर टैक्स डिमांड के रूप में डिमांड नोटिस जारी कर वसूलने की कोशिश की गई, लेकिन एक जगह जाकर भारतीय एजेंसियों की सुई रुक जाती थी कि हसन अली के नाम पर इतने एस्टे्स और संपत्ति हैं ही नहीं तो हसन अली से रिकवरी कैसे की जाए? लेकिन स्विस बैंक में चल रहे दर्जनों खातों और उनमें जमा धन के बारे में जब एजेंसियों ने पता कर ही लिया था, तब भारत सरकार ने ऐसा क्यों नहीं किया कि जो सही मायनों में असली लाभ पाने वालों में थे और उन खातों में संचालन में शामिल थे? उनको ढूंढ़ निकालने में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया? एक हसन अली खान और उनके साथी काशीनाथ टापोरिया के अलावा और लोगों को जांच के दायरे में क्यों नहीं लिया गया? और भारतीय एजेंसियों ने जब इतनी बड़ी रकम हसन अली खान के नाम पर खड़ी कर दी थी तो इसके बारे में गंभीरतापूर्वक विचार क्यों नहीं किया गया?

जो मुकदमा हसन अली खान और वित्त मंत्रालय के बीच करीब नौ सालों से चल रहा था, उस पर इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल का इस तरह का ऑर्डर हमारी जांच एजेंसियों के लिए अब तक का सबसे बड़ा मजाक ही कहा जाएगा. हालांकि नौ साल की जांच-पड़ताल के बाद इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल के इस ऑर्डर में यह गुंजाइश रखी गई है कि अगर आयकर विभाग को लगता है कि हसन अली खान के बारे में और जानकारी जुटाई जा चुकी है तो दिसम्बर तक दोबारा हसन अली खान से जुड़े मसलों को री-ओपन करके उसमें नए सिरे से आकलन करके पुन: दूसरी बार ऑर्डर पास किया जाए. लेकिन अपने वित्तीय लेन-देन के बजाय हसन अली लंबे समय तक नकली पासपोर्ट बनाने की वजह से जेल में रहा.

इन नौ सालों की जांच-पड़ताल का कोई नतीजा निकला हो या न निकला हो, लेकिन इतना पता शायद सबको चल ही गया कि जिस आदमी पर लाखों करोड़ रुपये काला धन छुपाने के आरोप में सवा लाख करोड़ रु. की टैक्स डिमांड जारी की गई, उससे अभी तक भारत सरकार दस करोड़ रुपये भी रिकवर नहीं कर पाई. हां, इतना जरूर है कि इस हसन अली खान के चलते वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी की जनहित याचिका पर देश में ब्लैक मनी को रोकने और विदेशों से ब्लैक मनी को वापस ले आने के लिए एक ठोस कानून बन गया. 5 जनवरी, 2007 को जब मैंने इस रिपोर्ट पर काम करना शुरू किया, तब मुझे भी अंदाजा नहीं था कि हसन अली का मसला इतना बड़ा बनकर निकलेगा. 7 मार्च, 2007 को स्टार न्यूज पर मैंने एक घंटे की विशेष रिपोर्ट हसन अली खान से जुड़ी जांच को लेकर पेश की थी. जिस रिपोर्ट की मीडिया जगत में अच्छी खासी चर्चा भी रही थी. लेकिन इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने इस मसले को निपटाते हुए हसन अली खान के ऊपर टैक्स डिमांड दस करोड़ रुपये मानते हुए दोबारा इस मसले को री-ओपन करने का आदेश दिया तो इससे एक बात तो साबित हो जाती है कि भले ही ब्लैक मनी को लेकर हमारे देश में ठोस कानून बन गया हो, एचएसबीसी जेनेवा, एचएसबीसी फ्रांस और लिचीस्टीन से आए खातों से कुल मिलाकर अभी तक पांच हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि नहीं वसूली जा सकी है. जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बाबा रामदेव अपने भाषणों में कहा करते थे कि अगर विदेशों से ब्लैक मनी आ जाए तो एक लाख से लेकर 15 लाख रुपये हर भारतवासी के खातों में जमा हो सकता है. ऐसे दावों की पोल हसन अली से लेकर विदेशों से आए सभी खातों की जांच से खुल चुकी है. हां, इतना जरूर है कि अगर हमारी एजेंसियां बेहतर खुफिया सूचनाएं एकत्र करें और भारत सरकार अपनी ताकत का इस्तेमाल करे तो जिस तरह से अमेरिकी नागरिकों के विदेशी खातों के बारे में स्विट्जरलैंड ने सभी जानकारी अमेरिका को सौंप दी, उसी तरह से सभी भारतीय खातों की जानकारी भारत के पास आ सकती है, लेकिन कहीं न कहीं दो देशों के रिश्तों के बीच कुछ न कुछ ऐसी मजबूरी होगी कि हमारे प्रधानमंत्री घोषणा करने के बाद भी इस दिशा में विदेशी खातों को लेकर ठोस कदम नहीं उठा पाए तो इसकी कोई न कोई ठोस वजह रही ही होगी.

हाल ही में पनामा में अनेक भारतीयों के अवैध खातों के बारे में एक राष्ट्रीय अखबार ने विस्तार से सभी सूचनाएं छापीं, जिसमें कई फिल्मी सितारे और कई उद्योगपतियों के उन खातों के बारे में बताया गया, जिनकी सूचना पनामा में खाता रखने वालों ने भारतीय एजेंसियों के साथ साझा नहीं किया था. सवाल यह उठता है कि विदेश में खाते खोलने की जरूरत क्यों पड़ती है? इसका उद्देश्य केवल व्यापार करना ही होता है या कुछ और भी? पनामा में खुलने वाले खातों को देखा जाए तो इन्हें तीन हिस्सों में बांटकर देखा जा सकता है. साल 2004 से पहले जो खाते खोले गए और उन्हें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की बिना अनुमति के पैसे बाहर भेजे गए तो उन सभी लोगों पर उस समय फेरा और फेमा के तहत मुकदमा चलाया जा सकता था. 2004 के बाद भारत सरकार ने आरबीआई की अनुमति के बाद शेयरों की खरीद-फरोख्त के लिए पैसा बाहर भेजने की अनुमति दी थी, लेकिन सवाल अब यह उठता है कि साल 2004 से लेकर 2013 के बीच भारतीयों द्वारा जो पैसे पनामा भेजे गए, उनका मकसद शेयरों की खरीद-फरोख्त करना ही था या कुछ और भी? देखने में यह आया है कि 2004 से 2013 के बीच अनेक भारतीय उद्योगपतियों ने पहले कुछ फर्मो के शेयर खरीदे, बाद में उन कंपनियों के असली निदेशकों को हटाकर अपने डमी निदेशकों को बैठा दिया.

अगर पनामा में खुले खातों और फर्मो की ठीक से जांच की जाए तो प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग के तहत अनेक भारतीय फिल्मी सितारों और उद्योगपतियों के खिलाफ बड़ा मामला बनता है. साल 2013 के बाद भारत सरकार ने नियमों में काफी लचीलापन ला दिया था. ऑटोमेटिक रूट के तहत बिना आरबीआई की अनुमति के भी पैसा भेजा जा सकता था. हॉस्पिटिलिटी सेक्टर में निवेश के नाम पर बहुत सारी फर्मो और कंपनियों ने ऑटोमेटिक रूट से पैसा भेजा, लेकिन अगर से ठीक से जांच की जाए तो इसमें भी एक बड़ा घोटाला सामने आ सकता है कि बहुत सारी कंपनियों ने होटल और रिजॉर्ट खरीदने के लिए भेजे, लेकिन पैसा किसी और जगह पर लगा दिया. यही किस्सा बैंकों से हजारों-लाखों करोड़ रुपये लोन लेने वाली कंपनियों ने भी किया है.

भारतीय बैंकों में जो लोन घोटाला हुआ है, उसकी भी अगर जांच-पड़ताल की जाए तो यह ठीक-ठीक पता लगाया जा सकता है कि हर भारी-भरकम लोन लेने वाले समूहों ने विदेशों में अपना अच्छा-बड़ा आसियाना बना रखा है, जिसका उनके उद्योगों से कोई खास लेना-देना नहीं है. उस आसियाने का इस्तेमाल सिर्फ अपने और अपने मित्रों के एशोआराम के लिए किया जाता है. भारतीय एजेंसियों को यह बात समझ में आ चुकी है कि इतना बड़ा लोन घोटाला सिर्फ व्यापार में घाटा लगने से नहीं हुआ है, बल्कि जिस उद्देश्य के लिए लोन लिया गया, उस पैसे को वहां न लगाकर कई और अनुत्पादक कामों में लगाया गया. इसके चलते आज कई बैंक और कंपनियां, दोनों डूबने की कगार पर हैं.


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ

 
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