कायाकल्प से होगा कांग्रेस का बेड़ा पार

October 9, 2021

मुख्यधारा की राजनीति में कई बार सटीक दिखने वाला दांव भी उल्टा पड़ जाता है और तय दिख रही कामयाबी हाथ से छिटक कर ऐसी नाकामी में बदल जाती है, जिसकी सफाई में दिया गया हर तर्क बेतुका दिखता है। हाल के कुछ साल में कांग्रेस का रिपोर्ट कार्ड ऐसी तमाम आपदाओं से सुसज्जित दिखता है, जिन्हें किसी और ने नहीं, खुद कांग्रेस ने न्योता देकर बुलाया और फिर उसका भारी खमियाजा उठाया। पहले मध्य प्रदेश हाथ से फिसला, फिर राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनों ने अपनों के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है, और अब पंजाब में उसका सिंहासन डोला है।

राजनीति की नब्ज देखने वाले जानते हैं कि यह मर्ज क्या है? जब-जब नेतृत्व कमजोर होता है, तो पार्टी के अंदर से ऐसे बागी स्वर मुखर होते हैं। जरूरी नहीं है कि इनका मकसद पार्टी से बगावत का ही हो, लेकिन यह भी सच है कि इससे नेतृत्व असहज और पार्टी कमजोर होती है। तो क्या कमजोर होती जा रही कांग्रेस की वजह नेतृत्व का गहराता संकट है? जी-23 गुट के नेताओं की नाराजगी वैचारिक है, या इसके पीछे पीढ़ी का कोई टकराव है? क्या वजह है कि अंदरूनी विरोध पर कांग्रेस के एक्शन में एकरूपता नहीं दिखती, आखिर कांग्रेस अनिर्णय में क्यों है?   

सेनापति का अभाव इन तमाम सवालों की एक स्पष्ट वजह दिखती है। इस मामले में कपिल सिब्बल का पूरा बयान भले ही अनुशासनहीनता के पाले में खड़ा दिखता हो, लेकिन उनकी इस चिंता पर काफी चर्चा हो रही है कि आखिर, कांग्रेस को चला कौन रहा है? बहुतेरे लोग कह रहे हैं कि अगर सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेता को इस सवाल का जवाब नहीं पता है, तो फिर तो यह पूरी पार्टी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। दरअसल, मामला कुछ और ही है। न सिब्बल इतने नादान हैं, न कांग्रेस ही इतनी लाचार। आम कांग्रेसी या उसके विरोधी ही नहीं, पूरा देश जानता है कि सोनिया गांधी भले ही कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष हों, लेकिन पार्टी के ज्यादातर फैसले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अपने वफादार साथियों के साथ मिलकर ले रहे हैं।  

राहुल अब भी बड़ा चेहरा
पंजाब में बवाल मचा तो नवजोत सिंह सिद्धू से लेकर नये मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी तक राहुल की चौखट पर अपनी गुहार लेकर पहुंचे, छत्तीसगढ़ में मौजूदा सीएम भूपेश बघेल और सीएम-इन-वेटिंग टीएस सिंहदेव अपना झगड़ा सुलझाने के लिए राहुल के पास जाते हैं, राजस्थान में सचिन पायलट को जब अपने हक की बात करनी होती है, तो वो भी राहुल से ही मिलने पहुंचते हैं। हाल ही में कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी की कांग्रेस में एंट्री हुई, तो वहां राहुल गांधी के अलावा दूसरा कौन-सा बड़ा चेहरा मौजूद था? इसलिए अगर सिब्बल ऐसा सवाल पूछते हैं, तो जवाबदेही का सवाल उनसे भी पूछा जाएगा। केवल यह कह देना कि जी-23 न तो जी-हुजूर गैंग बनेगा और न पार्टी छोड़कर जाएगा, उन्हें सवालों से बरी नहीं कर देता। दरअसल, जो कांग्रेस की दिक्कत है, वही जी-23 के नेताओं की दिक्कत है। सवाल उत्तर में है, तो उसका जवाब दक्षिण में ढूंढो, मर्ज पूर्व में है तो उसका इलाज पश्चिम में तलाशो। जब पार्टी फोरम पर कोई सवाल उठे, तो निर्णय लेने के लिए सोनिया गांधी के नाम पर पार्टी की हां में हां मिला दो और फिर बाहर आकर उसी नेतृत्व के फैसले पर सवाल उठा दो। दूसरा, इनमें गिने-चुने ही नेता हैं, जो जमीन से जुड़े हैं और अपने दम पर चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं। इस लिहाज से ये नेता कांग्रेस ही नहीं, मौजूदा दौर की राजनीति में भी ‘मिसफिट’ होते दिख रहे हैं, जहां जीत की गारंटी के बिना सियासी कॅरियर की कोई वारंटी नहीं देता।

पार्टी में अनिर्णय की स्थिति
तो फिर अगर राहुल गांधी कांग्रेस में इतने पावरफुल नेता हैं, तो उनकी ताजपोशी को लेकर पार्टी में इतना अनिर्णय क्यों है? दरअसल, इसकी वजह फैसले की स्वीकार्यता और उसकी सफलता पर संशय से जुड़ा है। आने वाले दिनों में पांच राज्यों में चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश और मणिपुर में कांग्रेस के लिए कोई उम्मीद नहीं दिखती, जबकि पंजाब में तमाम सिर-फुटौव्वल के बावजूद जीत दोहराने और उत्तराखंड को उसे अपने पाले में लाने का भरोसा है। फिलहाल की स्थिति में गोवा पर संशय बना हुआ है। कांग्रेस के अंदरखाने यह सोच है कि अगर चुनावों का नतीजा फिफ्टी-फिफ्टी भी रहता है, तो इसका सेहरा राहुल के सिर बांधकर उसी सिर पर अध्यक्ष पद का ताज भी पहनाया जा सकता है। ऐसी हालत में इस फैसले को न तो चुनौती मिल पाएगी, न ही इस पर किसी सवाल को तवज्जो मिल पाएगी। साथ ही, राहुल पार्टी को चलाने के लिए फ्री-हैंड की अपनी शर्त पूरी करवाने में भी कामयाब हो सकते हैं। राहुल जानते हैं कि कन्हैया, जिग्नेश समेत तमाम युवा नेता इस एक्शन प्लान को तभी मजबूती दे सकते हैं, जब इन नेताओं को पूरा ‘एक्सपोजर’ और राजनीति करने के खुले अवसर मिलें और यह तभी संभव हो पाएगा जब पहले खुद उन्हें ऐसा करने की आजादी मिले।

अगर यह प्लान हकीकत में बदलता है, तो फिर कांग्रेस में हम उस बदलाव की रफ्तार तेज होते देख सकेंगे जिसके तहत कैप्टन अमरिंदर सिंह की रु सवाई मोल ली गई है। कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेताओं को कांग्रेस से जोड़ना इसी विचार से प्रेरित राहुल-प्रियंका की उस दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा दिखता है जिसमें सचिन पायलट, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, बी. श्रीनिवास जैसे युवा नेताओं के कद को बढ़ाने की तैयारी है। लखीमपुर-खीरी मामले में भी राहुल-प्रियंका का साथ देने के लिए यही चेहरे अपने-अपने स्तर पर संघर्ष करते दिखे हैं। हालांकि इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है। इस बात को नहीं भूला जा सकता कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को छोड़कर पार्टी की रीति-नीति पर सवाल उठाने वाले तमाम सीनियर नेता अब भी पार्टी में बने हुए हैं। पार्टी को पीठ दिखाने वाले राहुल के करीबी नये चेहरे ही रहे हैं। राहुल गांधी को लेकर पार्टी में अनिर्णय की एक वजह यह भी है।

कांग्रेस के पास विकल्प
तो फिर कांग्रेस के पास विकल्प क्या है? क्या कांग्रेस के लिए अब वह समय आ गया है जब उसे इस प्रश्न का जवाब गांधी परिवार के बाहर ढूंढना चाहिए? यह विकल्प संभव हो सकता है, लेकिन कितना स्वीकार्य होगा, इस पर बड़ा प्रश्न चिह्न है। ज्यादातर लोगों को लगता है कि इससे कांग्रेस एक बार फिर सीताराम केसरी वाले युग में जा सकती है। लेकिन जो इस राय के पक्षधर हैं, वो दलील देते हैं कि कांग्रेस वैसे भी अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर में है, तो इससे बुरा और क्या हो सकता है? बेशक, यह दलील आज की कांग्रेस की हकीकत हो, लेकिन गुण-दोष के विश्लेषण पर तब भी खरी नहीं उतरती है। तमाम नाकामियों और नकारात्मक छवि बनने के बावजूद राहुल गांधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पहली पसंद हैं, और विपक्ष के बीच भी उनके प्रतिनिधि चेहरे के रूप में सबसे ज्यादा स्वीकार्य हैं। इसलिए चाहे जी-23 के नेता हों या किनारे कर दिए गए दूसरे नेता, उनके बयानों से कांग्रेस को लेकर भले ही गलत पैगाम जाता हो, लेकिन राहुल गांधी को लेकर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिखता है।

आगे की डगर नहीं आसान
पार्टी का नेतृत्व राहुल गांधी करें या कोई और, इतना तय है कि कांग्रेस के लिए आगे की डगर आसान नहीं है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बाद अब पंजाब में सरकार बनाए रखना कांग्रेस का नया सिरदर्द है। पंजाब से कांग्रेस नेतृत्व ने क्या सीखा, यह आने वाले दिनों में राजस्थान और छत्तीसगढ़ को लेकर उसकी रणनीति से समझ आ जाएगा। पिछले दिनों फैसलों में देरी और फिर गलत फैसले लेकर कांग्रेस ने अपना काफी सियासी नुकसान कर लिया है। जनता का मोहभंग होने के साथ ही उसके अपने नेताओं का विास भी पार्टी से हिला है। इसका सबसे ज्यादा फायदा तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे दलों को मिल रहा है, जो न केवल कांग्रेस के असंतुष्टों का नया आशियाना बन रहे हैं, बल्कि उसकी सियासी जमीन में घुसपैठ भी कर रहे हैं। आने वाले दिनों में देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस खुद को इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए कोई नई जुगत लगाती है, या फिर उसी अनिर्णय पर कायम रहती है, जो किसी दीमक की तरह पार्टी को अंदर-ही-अंदर खोखला करता जा रहा है।


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ

 
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